आध्यात्म-विज्ञान

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जानों तो सच मानों तो झूठ

कुछ बातें ऐसी होती है कि इंसान महसूस तो कर सकता है।लेकिन जब वही बातें दूसरों के सामने रखता है तो वह उन बातों को साबित करने में असमर्थ हो जाता हैं ऐसे में अक्सर सामने वाला बात बोलने वाले को झूठा माननें को मजबूर हो जाता है। ऐसे मे बोलने वाला वाचक, अपने अनुभव को जो उसने कभी महसूस किया होता है कैसे साबित करें ? जब कि बोलने वाला जानता है कि उस ने कोई बात झूठ नही बोली।यह समस्या अक्सर अध्यातमिक अनुभवों को प्रमाणित करते समय मे आती है या जब कोई पारलोकिक विषय का कोई अनुभव सुनाता है तो आती है। ऐसे समय मे अक्सर वाचक को मानसिक रोगी मानना आम बात हो गई है।जब कि वास्तविकता यह है कि अगर आप को वह अनुभव कभी हुए ही नही, तो आप उसे समझेगें कैसे ?

इन बातों के अविश्वास का एक दूसरा कारण भी है। आज सभी जगह योग्य लोगो के साथ अयोग्य लोग भी इन कामों मे उतर आए हैं।ऐसे मे सही और गलत की पहचान करना अति कठिन हो गया है।आज ९९% लोग ऐसे हैं जो इस विषय में कुछ जानकारी नही रखते लेकिन वे अपनी लच्छेदार बातों से लोगो को अक्सर बरगलाते रहते हैं।आज वे अध्यात्मिक गुरू बने बैठे हैं या तांत्रिक बने बैठे हैं।जिस तरह डाकटरॊं के साथ झॊलाछाप डाकटर बैठे हैं। ऐसे मे लोगों का भ्रमित होना स्वाभाविक ही है। जितने धर्म गुरू आज भारत मे हैं और जितना वह लोगो मे अध्यात्म की लौ जलाने की कॊशिश , अपने प्रवचनों द्वारा कर रहे हैं, उस का १% भी लोगो को फायदा नही पहुँच रहा है।उस का कारण साफ है कि वह खुद उस अध्यात्मिक जीवन के बारे मे कुछ नही जानते ।उन के पास अपना कोई अनुभव नही है। वह मात्र धार्मिक ग्रंथों को रट्कर लोगो को सुना रहे हैं । ऐसे में लोगो पर उनका असर कैसे हो सकता है ? कुछ धर्म गुरूऒं को छोड़ कर शेष गुरू मात्र अपनी दुकान चला रहे हैं। जिनका एक मात्र उद्देश्य संपत्ति एकत्र करना व विलासी जीवन जीना है। तभी तो ऐसे नकली गुरूओं द्वारा दूसरों के धार्मिक सिद्धातों से छेड़-छाड़ कर के अक्सर प्रचार पाने की कोशिश , मीडीया मे बनें रहनें की कोशिश होती रहती है। ऐसे गुरू घंटाल लोग मीडीया मे बने रहने के सारे हथकंडे जानते हैं।

यहाँ पर इन विषयों पर(अध्यात्म,तंत्र और आत्मा) पर इन बातो को लिखने का मेरा एक मात्र उद्देश्य यही है कि जब तक आप स्वयं अनुभव नही करते,जब तक आप को स्वयं सत्य के दर्शन नही होते , आप विश्वास ना करें। आप किसी की बात पर यकीन ना करें।चाहे वह मै कहूँ या कोई और। तभी आप सत्य को पा सकेगें। यहाँ एक निजि सूत्र , जिसे मै स्वयं सत्य को जानने हेतू , अपने जीवन मे अपनाता रहा हूँ आप से बाँट्ना चाहूँगा ।वह है कि जब कोई आप से यह कहता है कि आप अगर इस कार्य को इस ढंग से करेगें तो आप को यह-यह अनुभव होगा तो ऐसे में आप अपने पूर्वाग्रहों से उपर उठ कर, पहले पूरी ईमानदारी से उस कार्य को करके देखे । फिर उसकी सत्यता या असत्यता पर सवाल उठाएं। ना कि बिना जानें उस पर अपना फैसला कर लें। यदि आप इस सूत्र को मानकर ही नही बल्कि अच्छी तरह जान कर, आगे बढेगें तो निश्चय जानें आप को सत्य को जानने मे और नये-नये विषयों को जानने में कोई अड़चन नही आएगी।फिर आप के सामनें (अंतरिक्ष)ब्रह्मांड के गर्त मे छुपे अंनत रहस्यों की परतें धीरे-धीरे खुलने लगेंगी।

May 31, 2007 - Posted by परमजीत बाली | Blogroll | | 1 Comment

1 Comment »

  1. सामने सब के स्वीकार करता हूँ
    हिन्दी से कितना प्यार करता हूँ
    कलम है मेरी टूटी फूटी
    थोड़ी सुखी थोड़ी रुखी
    हर हिन्दी लिखने वाले का
    प्रकट आभार करता हूँ
    आप लिखते रहिए
    मैं इन्तज़ार करता हूँ ।
    NishikantWorld

    Comment by Nishikant Tiwari | September 1, 2007


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